बदलाव की पुकार: 2025 की ओर एक नज़र और मेरी समझ
Change the script 2025 सही मायनों में इसका अर्थ वही गहराई से समझ आया – बदलाव की पुकार।
वह बदलाव जिसे हम देखना चाहते हैं, लेकिन उस बदलाव की राह में कुछ लोग पीछे छूट जाते
हैं।
सवाल यही है – पीछे कौन छूट रहा है?
क्या यह सिस्टम की वजह से है या उन चुनौतियों की
वजह से जिन्हें हम लगातार नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं?
युवाओं की कहानियों से निकले नैरेटिव:- युवाओं की कहानियों से ऐसे नैरेटिव सामने आए जिन्हें हमें पूरी तरह से समझना, सोचना और दोबारा बुनना होगा। क्योंकि इन्हीं नैरेटिव्स की वजह से कई लोग पीछे रह जाते हैं।
कुछ नैरेटिव्स मेरे मन में लगातार
गूंजते रहे:
- देर से पहुँचने पर मेरे बारे में क्या
जजमेंट बनेगा?
- अंग्रेज़ी न जानना क्या मेरे करियर को असफल
बना देगा?
- अलग होना दूसरों से मेरे लिए क्या चुनौतियाँ
और विपत्तियाँ लेकर आता है?
- औसत होना क्या एक विशेषाधिकार है या एक
कठिनाई?
- धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक होना, एक thriving
life जीने में मेरे लिए कितनी
मुश्किलें पैदा कर सकता है?
- परीक्षा का होना किस आधार पर तय है, और यह मेरी सफलता में बाधा है या सहायक?
- जो कंटेंट पढ़ाया जा रहा है, क्या वह सच में ज़रूरी है या उसे बदलने की
ज़रूरत है?
- और हाँ, उसमें जो भी बदलाव होंगे – वे मुझे किस तरह
का नागरिक बनाएंगे?
पूर्वाग्रह बनाम दृष्टिकोण:- मुझे यह समझ आया कि कई नैरेटिव्स ऐसे हैं जिन पर मैं काम करता हूँ ताकि कोई उनके कारण पीछे न छूटे। लेकिन कुछ नैरेटिव्स को स्वीकार करना कठिन होता है, क्योंकि उनमें हमारे पूर्वाग्रह (biases) जुड़े होते हैं।सोचने के बाद मैंने समझा कि पूर्वाग्रह दरअसल वही दृष्टिकोण (perspective) होते हैं जो कठोर हो जाते हैं और बदलना मुश्किल हो जाता है।लेकिन सही मायनों में दृष्टिकोण हमें एक नया आयाम देते हैं, और सोच में बदलाव की ओर ले जाते हैं।
सहानुभूति का मेल:- एक और बात साफ़ हुई – सारा मेल समानुभूति (empathy) का है। अगर हम समानुभूति रखते हैं तो शायद ही कोई पीछे छूट पाएगा। हमारे निर्णय भी ऐसे होंगे जिनमें सभी साथ चलें, और हमारे सामने एक समावेशी समाज खड़ा हो।
बदलाव के छोटे-छोटे कदम:- “बदलाव की पुकार” ने मुझे एक और नैरेटिव छू लिया। एक युवा ने साझा किया कि कैसे उनके शिक्षक रोज़ उन्हें स्कूल लेकर जाते थे ताकि वे समय से पहुँच सकें। यह मुझे लगा कि बदलाव सिर्फ़ सिस्टम में नीतियों से नहीं आएगा, बल्कि हम सबको – एक-एक व्यक्ति को – युवाओं के जीवन में वह समानुभूतिपूर्ण भूमिका निभानी होगी। समानुभूतिपूर्ण वयस्क (empathetic adult) का होना भी बदलाव की पुकार है।
बड़ा सवाल ? क्या हर कोई thrive
कर पाएगा?
अंत में एक सवाल मेरे मन में हमेशा रहता है “क्या इस असमानताओं से भरे समाज में हर कोई फल-फूल सकेगा?” इसका उत्तर मुझे मिला, और यह वही था जिसे मैं भीतर से मानता भी था। उत्तर ने मुझे मान्यता दी कि हाँ, यह संभव है। जब हम सब भावनाओं की शक्ति (power of emotions) को समझ जाएँगे और स्थापित कर पाएँगे, तो जो धारणाये है शक्तिशाली होने की (‘norm’ है being powerful ) वह ज़रूर बदलेगा और हम सब thrive कर पाएँगे।
मेरी यात्रा और कृतज्ञता:- यह शुरुआत है Change the script 2025 की, लेकिन मैं अंत में लिख रहा हूँ I am from (मैं कहाँ से हूँ)। इसने मुझे अपने पिछले तीन वर्षों को फिर से समझने और उनके लिए कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर दिया, जो अनुभवों से, सीख से और बदलाव की पुकार से भरे हुए रहे।
संक्षेप में :- "बदलाव की पुकार की पुकार है एक ऐसा thriving ecosystem बनाना,
जहाँ कोई भी आपके या मेरे चुनाव के
आधार पर पीछे न छूटे।"




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