मौन कौन

 


          

पहाड़ो का कुछ समझ नही आता? 


कभी खुद खड़े हो जाते

नदी का रास्ता रोके,

कभी खुद ही बह जाते ,

नदी में खुद को खोके।


नदियों का कुछ समझ नही आता ?


कभी रह जाती है ,

पहाड़ो के बंधन में,

कभी बहा ले जाती,

बंधन को अपने संग में।


एक बनाता बंधन,

दूसरा उसे तोड़ जाता,

तोड़ कर न जाने क्यों फिर

नए बंधन में बंध जाता।


नए दायरे परस्पर बनाते रहते,

ये दोनु एक दूजे लिए,

संग रहना भी चाहते,

संग बहना भी चाहते,

ये  दोनु एक दूजे के लिए।


पहाड़ क्यों रहते मौन? 

नदियां रहती क्यों शांत?

क्यों बर्बाद करते हम प्रकृति का एकांत?

क्यों पहाड़ो को काटकर ,

रास्ते हम बना रहे?

क्यों नदियों के राहों पर, 

हम अपना आशियाना बना रहे ?


जब नदिया सीखा देगी ,पहाड़ो को चलना,

तब समझ आएगा हमे क्या होता है छलना,

कब तक रहती नदी शांत और पहाड़ मौन,

अब कौन रहेगा उन घरों में, उन राहों में चलेगा कौन?


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